बदलते वक़्त

कपडे तह कर में अलमारी में रख रही थी की मुझे ठक-ठक की आवाज़ सुनाई टी।

बाजू वाला मकान खाली  था सो मैंने सोचा की शायद नए किरायेदार आये हैं।  पर नहीं, आवाज़ तो  घर के भीतर की थी।

‘बिट्टू , बिट्टू घर आ गए हो क्या?’ मेरे पांच वर्ष के बेटे को मैं खेलने ग्राउंड छोड़ आई थी। पता नहीं वह  घर कब चला आया। आगन में झाँका तो पाया की बिट्टू पत्थर से कुछ ठोक  रहा है। ‘क्या हुआ,  खेल छोड़ क्यूँ चले आये?’, मैंने पुछा।

 

‘सब सायकिल चला रहे हैं, आप कब दिलाओगे मुझे मेरी सायकिल?’, बिट्टू ने कहा।

कई दिनों से बिट्टू सायकिल की जिद लगाये है . आर्थिक तंगी कहिये या समय की व्यस्तता, बिट्टू को सायकिल दिलाना टलते  ही जा रहा था। ‘अरे थोड़े समय के लिए किसीसे मांग लेते।’, मैंने कहा।

कोई नहीं देता ‘, उसने कहा और गुस्से मैं चला गया

 

आजकल कें बच्चों को मिलबांट कर खेलना आता ही नहीं हैं।

 

 

हमारे बाजू  वाले घर में नए किरायेदार आ गए है। मद्रासी हैं, सो मैंने बात नहीं की हैं, अब तक। बात करने का कोई इरादा भी नहीं है. एक तो उन्हें हिंदी नहीं आती होगी और मुझे अंग्रेजी। हमारे खान पान अलग। जब उनका सामान आया  था तो मैंने खिड़की से झाँक कर देखा था। सामान सब काफी बढ़िया हैं, लगता है समृद्ध हैं।   ऐसो से दूरी बनाने में ही समझदारी है.

 

कुछ दिनों बाद मैंने देखा बिट्टू साइकिल चला रहा है। वह जब घर लोटा तो मैंने पूझा ,’ किसने दी तुम्हे साइकिल?’

 

‘राधा ने’

‘कौन राधा?’

‘अरे वही  जो हमारे बाजु में रहती है।’

‘उसका नाम राधा है?’

‘हां और आंटी का नाम है कविता’, इतना कह वह  भाग गया।

 

कविता मुझे आते जाते मिलती हैं, कई बार उसने मुझ से बात करने की भी कोशिश की पर में सिर्फ एक मुस्कान दे वहां से निकल जाती। नए लोगों से बात करने में आजकल डर  लगता हैं, कौन जाने कैसे लोग हों। किसी पर  भरोसा नहीं होता अब। इतनी बार अखबारों में पढा है की पड़ोसियों ने ही घर लूट लिया, रिश्तेदारों ने ही मानहानि की। अच्छा है सब से दूरी बना कर रखे।

 

 

 

बाज़ार से में सामान खरीद कर आ रही थी की मैंने देखा ग्राउंड खाली पड़ा है, बिट्टू बाहर  ही बेठा  होगा सोच मैंने कदम बढा  लिये। देखा तो सब बच्चे कविता के घर जमे हैं . एक ने मुझे आवाज़ लगायी,’ आंटी बिट्टू को चोट लग गयी।’

 

फुटबॉल खेलते वक़्त बिट्टू गिर गया था,  उसके टांग में चोट लगी थी और खून भी बह रहा था। कविता कें पति ने कार निकाली  और हम डॉक्टर के पास गये। मरहम पट्टी हुईं, इंजेक्शन लगी। मेरे पति काम से दुसरे शहर गए हुए थे. आने में अभी और दो चार दिन बाकि थे। उन दो चार दिनों मे  कविता और उसके परिवार ने दोस्ती और अपनत्व का एस परिचय दिखाया की मुझे अपने पूर्व व्यवहार पर शर्म आ रही थी।

 

हम बच्चो से कहते है की मिलजुल कर रहो  पर हम खुद उस बात का अनुसरण क्यों नहीं कर पाते?

*काल्पनिक

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8 thoughts on “बदलते वक़्त

      • 😀 Glad that you found so. But you know na how it is nowadays. We tend to mix so many languages into Hindi. Usually its Hinglish but here it is mixed with Malayalam Tamil too. So the sweetness and melody of Hindi is missing. This story too is not so pure in language. See I have used ground instead of maidan. The word maidan did not come in mind until late last night 😀

  1. Wah a pleasure to read you in Hindi. Indeed, easier preached than done. Though the society has become such that we have to even instruct our kids to not get too friendly with strangers :(. Strange are the times we live in. I don’t know how to type a comment in Hindi so had to make do with English.

    • Yes. I get skeptical even if someone asks me directions on the road. 😦 Thats how paranoid I have become.

      All these years I did not write in Hindi becoz didn’t know how to write in hindi in WP. Now also I do not know, wrote in blogger and copied from there 😀

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